नई दिल्ली: चुनाव आयोग से जुड़ी एक रिपोर्ट सामने आने के बाद SIR, वोटर लिस्ट और नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हो गई है। The Indian Express की पत्रकार रितिका चोपड़ा की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग की कुछ प्रक्रियाओं और फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन आपत्तियों का संबंध सीधे मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम जोड़ने-हटाने और चुनावी डेटा के डिजिटल प्रबंधन जैसे विषयों से बताया गया है। हालांकि, रिपोर्ट में उठाए गए सवालों के साथ चुनाव आयोग का पक्ष समझना भी जरूरी है।
SIR के बीच सामने आईं आंतरिक आपत्तियां
Special Intensive Revision यानी SIR मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। Indian Express के अनुसार, बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया बाद में कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची। इसी दौरान आयोग के भीतर मतदाता सूची से संबंधित कई प्रक्रियाओं पर लिखित टिप्पणियां सामने आईं।
रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने कुछ फैसलों को लेकर सवाल उठाए और अपनी चिंताएं रिकॉर्ड पर रखीं। इन पत्रों और टिप्पणियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
Form 6 में बदलाव को लेकर क्या हुआ?
इस पूरे मामले में Form 6 खास चर्चा में रहा। यह फॉर्म नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
Indian Express की एक अलग रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 में Form 6 से जुड़ी प्रक्रिया में SIR से संबंधित एक नया सवाल दिखाई देने लगा। इसमें आवेदक से पूछा गया कि उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में मौजूद था या नहीं।
रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी और बाद में संधू ने भी इस मुद्दे को रिकॉर्ड पर उठाया। उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्दों में इस बदलाव को “unauthorised” और “illegal” बताया गया था।
यहां चुनाव आयोग की स्थिति भी ध्यान देने योग्य है। आयोग ने कहा कि Form 6 में मूल बदलाव नहीं किया गया, बल्कि उसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। इसलिए इस मुद्दे पर रिपोर्ट में सामने आया पक्ष और आयोग की व्याख्या दोनों को साथ पढ़ना जरूरी है।
चुनावी डेटा के केंद्रीकरण पर भी सवाल
मामला सिर्फ Form 6 तक सीमित नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने चुनावी डेटा और मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम की कार्यप्रणाली को लेकर भी चिंता जताई।
विशेष रूप से, रिपोर्ट में मतदाता डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण और राज्य स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों की पहुंच से जुड़े सवालों का उल्लेख किया गया है। जोशी ने कथित तौर पर इस बात को लेकर ऑडिट की जरूरत बताई थी कि मतदाता डेटाबेस में बदलाव करने का अधिकार केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास रहे।
यह मुद्दा तकनीकी होने के बावजूद आम मतदाता से सीधे जुड़ता है। आखिर वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, सुधारने या हटाने की प्रक्रिया डिजिटल सिस्टम पर निर्भर करती है, इसलिए उस सिस्टम की भूमिका और जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है।
गोवा में 97 मतदाताओं का मामला क्यों चर्चा में आया?
रिपोर्ट में गोवा का एक मामला भी सामने आया है। Indian Express के मुताबिक, SIR से जुड़े मामलों की जांच के दौरान कुछ मतदाताओं ने जरूरी दस्तावेज पेश किए और Electoral Registration Officers यानी EROs ने 97 लोगों को पात्र पाया।
लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित सॉफ्टवेयर में उस निर्णय को दर्ज करने की सुविधा समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी। नतीजतन ये 97 नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए।
यह उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह सवाल उठता है कि जब किसी स्थानीय वैधानिक अधिकारी का निर्णय और डिजिटल सिस्टम की क्षमता आपस में मेल न खाएं, तो अंतिम निर्णय किस तरह दर्ज किया जाता है।
पश्चिम बंगाल में अपीलों का मुद्दा
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल का मामला भी विस्तार से सामने आया। वहां SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं से जुड़ी अपीलों की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए।
Indian Express के अनुसार, आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि बड़ी संख्या में अपीलें लंबित थीं। इनमें हटाए गए मतदाताओं की ओर से नाम बहाल करने की अपीलें भी शामिल थीं।
रिपोर्ट के मुताबिक, संधू ने यह सवाल उठाया था कि कुछ मामलों में आयोग की ओर से अपील दायर करने का अधिकार किसे दिया गया और इसकी प्रक्रिया क्या थी।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद चुनाव आयोग की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई। आयोग ने 14 लिखित टिप्पणियों के अस्तित्व या उनके रिकॉर्ड में होने पर विवाद नहीं किया, लेकिन उन्हें निर्णय प्रक्रिया के दौरान दी गई सुझावात्मक टिप्पणियां बताया।
आयोग ने यह भी कहा कि पिछले एक साल में उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
यानी उपलब्ध जानकारी में दो पहलू साफ तौर पर दिखाई देते हैं—एक ओर दो चुनाव आयुक्तों की दर्ज की गई आपत्तियां हैं, जबकि दूसरी ओर आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
मामला सिर्फ विवाद का नहीं, प्रक्रिया का भी है
इस पूरे घटनाक्रम को केवल व्यक्तियों के बीच मतभेद के रूप में देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा। असली सवाल उन प्रक्रियाओं का है जिनके जरिए देश की मतदाता सूची तैयार और अपडेट की जाती है।
किसी नए मतदाता का नाम कैसे जोड़ा जाता है, किसी पुराने नाम को हटाने से पहले क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है, स्थानीय अधिकारियों की भूमिका कितनी रहती है और डिजिटल सिस्टम में अंतिम नियंत्रण किस स्तर पर होता है—ये सभी सवाल सीधे चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता से जुड़े हैं।
रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट ने इन्हीं प्रक्रियाओं से जुड़े दस्तावेजी सवालों को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाया है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मत बताते हुए अलग-अलग राय को सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा कहा है। इसलिए पूरे मामले को समझने के लिए रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों और आयोग के आधिकारिक स्पष्टीकरण—दोनों को साथ देखना जरूरी है।
